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संकट में हनुमान जी से कैप्टन स्मित को मिली शक्ति!

संकट में हनुमान चालीसा, संस्कारों से अदम्य साहस!
संकट में हनुमान चालीसा, संस्कारों से अदम्य साहस!

एक तरफ भारतीय संस्कारों में पला-बढ़ा एक ऐसा युवा पायलट, जो जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते हुए भी हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था और सैकड़ों यात्रियों की जान बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा रहा था। दूसरी तरफ ऐसे कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी और सोशल मीडिया के चेहरे, जिन्होंने घटना की गंभीरता और उसके मानवीय पहलू को समझने के बजाय पायलट की नीयत, घटना की प्रस्तुति और उसके पीछे के कथित एजेंडे पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं, आर्थिक शक्ति या सैन्य सामर्थ्य से नहीं है। भारत की वास्तविक पहचान उसकी सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और उन संस्कारों में है, जो व्यक्ति को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीना सिखाते हैं।

हनुमान चालीसा में एक चौपाई है:

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

यहां हनुमान चालीसा केवल कुछ चौपाइयों का पाठ नहीं, बल्कि साहस, समर्पण, निष्ठा और संकट से लड़ने की आध्यात्मिक प्रेरणा है। इसका जीवंत उदाहरण हाल ही में पूरी दुनिया ने देखा।

और टल गया संकट… !!

30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में उस समय भयावह स्थिति पैदा हो गई, जब सह-पायलट ने कॉकपिट में कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला कर दिया। हमले में स्मित गंभीर रूप से घायल हो गए। विमान तेजी से नीचे की ओर जाने लगा। एक तरफ वह खुद जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे, दूसरी तरफ विमान में सवार यात्रियों की जिंदगी भी खतरे में थी।

ऐसे समय में जब किसी भी व्यक्ति का मानसिक संतुलन डगमगा सकता है, स्मित ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि हमले के दौरान वह हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। यह बात सामान्य लग सकती है, लेकिन उस परिस्थिति की गंभीरता को समझिए। एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल है, विमान नियंत्रण खोने की स्थिति में है और सैकड़ों जिंदगियां दांव पर लगी हैं। ऐसे समय में उसके मन में जिस प्रार्थना का स्मरण है, वह उसके जीवन का हिस्सा बनी हुई है।

स्मित ने प्रधानमंत्री मोदी को यह भी बताया कि वह अपने दो साल के बेटे के साथ प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। यानी यह कोई अचानक पैदा हुई धार्मिक भावना नहीं थी। यह उनके घर-परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही एक सांस्कृतिक परंपरा और जीवनशैली का हिस्सा है।

मां के संस्कार और पिता की परंपरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्मित की माता जी श्रीमती गीता बहन को प्रणाम करते हुए कहा कि जिस मां ने अपने बेटे में ऐसे संस्कार डाले, वह निश्चित रूप से सम्मान की पात्र हैं। उन्होंने स्मित के पिता भूपेंद्र भाई का भी आदरपूर्वक उल्लेख किया।

इस दौरान ये पता चला कि स्मित के परिवार में हनुमान चालीसा पढ़ने की परंपरा पुरानी है। उनके पिता ने भी बताया कि परिवार में सोने से पहले और सुबह उठने के बाद हनुमान चालीसा पढ़ने की परंपरा रही है। बच्चों को गोद में बैठाकर यह पाठ सुनाया जाता है।

जरा सोचिए, आज जब एक बड़ी आबादी अपने बच्चों को मोबाइल, सोशल मीडिया और आधुनिक जीवनशैली की दौड़ में व्यस्त रखने लगी है, तब एक परिवार अपने दो साल के बच्चे को हनुमान चालीसा सुना रहा है। ऐसे में स्मित का वह कथन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम देश से दूर हैं, लेकिन अपनी संस्कृति से दूर नहीं हैं।

‘हम जान लेने वाले नहीं, जान बचाने वाले लोग हैं’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मित के साहस की प्रशंसा करते हुए एक ऐसी बात कही, जो भारतीय सभ्यता के मूल चरित्र को सामने रखती है। उन्होंने कहा कि आज पूरा देश गर्व से कह सकता है कि हम भारतीय जान लेने वाले नहीं, बल्कि जान बचाने वाले लोग हैं। प्रधानमंत्री ने इसी भावना को गांधी जयंती से जोड़ते हुए कहा कि स्मित ने अहिंसा का वास्तविक अर्थ अपने आचरण से दिखाया है।

वसुधैव कुटुम्बकम्: भारतीय संस्कृति का वास्तविक अर्थ

भारत की संस्कृति का मूल दर्शन कभी केवल अपने परिवार, अपने समाज या अपने देश तक सीमित नहीं रहा। हमारी सभ्यता ने सदियों पहले दुनिया को एक परिवार मानने का संदेश दिया।

वसुधैव कुटुम्बकम् — अर्थात संपूर्ण विश्व एक परिवार है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः — अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोग रहें।

ये केवल संस्कृत के श्लोक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन के आधार हैं।

घटना के दौरान स्मित खुद गंभीर रूप से घायल थे। उनके सामने अपनी जान बचाने की चुनौती थी। लेकिन उन्होंने यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। अपनी 17 वर्षों की उड़ान संबंधी विशेषज्ञता और तत्काल निर्णय लेने की क्षमता का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोलने की अंतिम कोशिश की। इसके बाद यात्रियों ने भी हमलावर को काबू करने में मदद की और विमान को सुरक्षित रूप से सऊदी अरब के तबुक में उतारा गया।

कट्टरपंथियों को नहीं पची हनुमान भक्त की जीत !

अब इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर चर्चा करना आवश्यक है।

सोशल मीडिया पर कुछ चर्चित पत्रकारों और टिप्पणीकारों की प्रतिक्रियाएं एक अलग ही दिशा में जाती दिखाई दीं। हमलावर और हमले की परिस्थितियों पर सवाल उठाने के बजाय चर्चा का केंद्र इजरायल, नेतन्याहू, मोदी सरकार, कथित प्रचार और भारतीय दक्षिणपंथ की राजनीति बन गया।

  • पत्रकार अरफा खानुम शेरवानी ने 1 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर इजरायल की कथित प्रचार मशीन और भारतीय दर्शकों की प्रतिक्रिया को लेकर टिप्पणी की। उनकी पोस्ट का आशय था कि इजरायली प्रचार को भारतीय दर्शक बिना सवाल किए स्वीकार कर रहे हैं।
  • पत्रकार राना अय्यूब ने भी इस घटना के बाद भारत के दक्षिणपंथी विचारों और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के प्रति समर्थन को मुसलमानों के प्रति कथित घृणा से जोड़ते हुए टिप्पणी की।
  • आरजे सयमा की सोशल मीडिया टिप्पणी में उन लोगों पर सवाल उठाया गया, जो घटना की अलग व्याख्या कर रहे थे। उन्होंने यह संदेश दिया कि किसी सच को झूठ कह देने से वह झूठ नहीं हो जाता।
  • पत्रकार गार्गी रावत ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा कि विमान के लगभग 17 हजार फीट नीचे आने के बावजूद यात्रियों को चोट क्यों नहीं लगी? विमान को संभाले जाने को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने एयर इंडिया की एक पुरानी घटना से इसकी तुलना भी की।
  • फिल्म अभिनेता और सोशल मीडिया टिप्पणीकार कमाल राशिद खान ने तो कैप्टन स्मित की नीयत पर ही टिप्पणी कर दी।उन्होंने दावा किया कि स्मित हमेशा प्रसिद्ध होना चाहते थे, पॉडकास्ट करते थे और अब आखिरकार प्रसिद्ध हो गए।

आखिर भारतीय संस्कृति और हिंदू आस्था से असहजता क्यों?

इन तमाम प्रतिक्रियाओं को एक साथ रखकर देखिए। एक भारतीय पायलट संकट की घड़ी में हनुमान चालीसा का स्मरण करता है। वह अपने दो साल के बच्चे को भी हनुमान चालीसा सुनाता है। प्रधानमंत्री उसकी मां को प्रणाम करते हैं और उसके पारिवारिक संस्कारों की प्रशंसा करते हैं।

लेकिन कुछ लोगों ये बात अच्छी ही नहीं लगी, उनके लिए कहीं इजरायल का मुद्दा आ जाता है, कहीं मोदी और नेतन्याहू की राजनीति, कहीं दक्षिणपंथी विचारधारा, कहीं प्रचार का आरोप और कहीं पायलट की प्रसिद्धि की इच्छा!

महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या किसी भारतीय को अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त करने का अधिकार नहीं है? क्या विदेश में रहने वाला भारतीय अपनी संस्कृति से जुड़ा रहे तो उसमें कोई समस्या है? क्या हनुमान चालीसा पढ़ने वाला व्यक्ति आधुनिक विमानन तकनीक का विशेषज्ञ नहीं हो सकता? क्या धार्मिक संस्कार और आधुनिक शिक्षा एक साथ नहीं चल सकते?

कैप्टन स्मित की असली विरासत

आज भारत को कैप्टन स्मित मच्छार जैसे युवाओं की कहानी केवल इसलिए नहीं सुनानी चाहिए कि उन्होंने एक विमान में संकट का सामना किया। बल्कि इसलिए भी सुनानी चाहिए कि उन्होंने अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक दुनिया में अपनी जिम्मेदारी निभाई।

यह कहानी हर भारतीय परिवार के लिए एक संदेश है कि अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा दीजिए, उन्हें दुनिया की ऊंचाइयों तक पहुंचाइए, लेकिन उन्हें अपनी जड़ों से कटने मत दीजिए।

तथ्य एवं संदर्भ

लेख के प्रमुख तथ्यों के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक बातचीत, पीआईबी, एनडीटीवी और अन्य प्रकाशित रिपोर्टों को आधार बनाया गया है।

 

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