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यदि मोदी 2014 में न आते तो क्या होता?

कौशल सिखौला

यह बात तो साफ हो गई कि यदि मोदी 2014 में न आते तो राम मंदिर तो अभी 5000 साल भी नहीं बनता। इसे अब अनेक विपक्षी भी मान बैठे हैं। देश का इतना नाम भी न होता और देश की चहुंमुखी शक्ति इतनी न बढ़ती कि चीन जैसा कट्टर दुश्मन तारीफ करने पर मजबूर हो जाए। मोदी के आने से देश का खोया स्वाभिमान वापस लौट आया है। आर्थिक, सामरिक और सीमावर्ती मोर्चों पर भारत की ताकत काफी बढ़ गई है। भारत अब फ्रंट फुट पर खेलता है, कनाडा जैसे पूंजीवादी देश को इग्नॉर कर सकता है, लक्षद्वीप में एक फोटो शूट के करामाती परिणाम ला सकता है।

भारत की स्वीकार्यता इस कदर बढ़ गई कि आबुधाबी में विशाल मंदिर बनने पर किसी अरब देश को ऐतराज नहीं है। मोदी के आने का असर देश के आंतरिक ढांचे पर पड़ा है। छद्म धर्मनिरपेक्षता की पोल खुल गई और सच्चा राष्ट्रवाद उभर आया। कईं मायनों में ऐसा लग रहा है मानों देश किसी उदास और अंधेरी गुफा से बाहर निकल आया हो। 2014 के लिए यदि मोदी के बजाय भाजपा ने किसी और नेता को प्रोजैक्ट किया होता, तो भी सत्ता मिलनी मुश्किल थी। मिल जाती तो 370 और तीन तलाक़ जैसे बड़े प्रश्न हल हो जाने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

इस दौरान निजी घृणा और व्यक्तिगत ईर्ष्या में डूबकर विपक्ष अकेला पड़ता गया, जनता उसका साथ छोड़ती गई। दो बार की करारी हार और बीच बीच में राज्यों की पराजयों ने विपक्ष को और कसैला बना दिया। इतना कसैला कि विपक्ष की मोदी नाम से नफरत पहले राष्ट्रवाद से नफरत में बदल गई, फिर हिन्दुत्व से नफ़रत में बदली और पतन यहां तक हुआ कि अब भगवान राम के प्रति नफरत में बदल गई। इस तरह तो मोदी से नफरत देश से नफ़रत में बदल जाएगी एक दिन? मोदी से नफरत के राजनैतिक कारण ढूंढिए। आप ने तो राम कृष्ण की बात करने को नफ़रत का कारण बना दिया?

और सीधे सीधे राम मंदिर को? शायद प्रेरणा नेहरू से ली, जिन्होंने सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण में जाने से इंकार कर दिया था। इंकार ही नहीं राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद को भी पत्र भेजकर कहा था कि उनका जाना उन्हें पसंद नहीं आएगा। पर वे तो राजेंद्र बाबू थे, एक न सुनी पटेल के आयोजन में गए। अब सोनिया को राम से कोई मतलब नहीं था, तो खड़गे और अधीर रंजन की क्या बिसात? तब पटेल थे, इसलिए नेहरू नहीं गए अब मोदी है तो सोनिया क्यूं जाएं। खैर किसने क्या खोया क्या पाया, जानने का समय करीब आ गया है। अयोध्या का लौटता अपार वैभव बहुतों के अरमानों पर पानी फेरने वाला है।

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