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गर्व करने वाली सेंगोल की कहानी

 

अदंड्योस्मि…धर्मदंड्योसि

प्राचीन भारत में एक अद्भुत प्रथा प्रचलित थी. जब राजा का राज्याभिषेक होता था, तो राजा कहता था ‘अदंड्योस्मि’ अर्थात् मुझे दंड नहीं दिया जा सकता. ऐसे में राजा का गुरु एक कुश का प्रतीकात्मक दंड लेकर राजा को मारता हुआ कहता था – ‘धर्म दंड्योसि’ अर्थात् तुम्हारे ऊपर भी धर्म का दंड है

राजा मार खाते हुए यज्ञ की पवित्र अग्नि की परिक्रमा करता था. यह केवल कर्मकांड नहीं था. राजा इस बात को याद रखते हुए ही समस्त निर्णय लेता था जिससे धर्म की हानि ना हो, धर्म विरुद्ध कोई कार्य न हो.

लोकतंत्र मे संसद सर्वोपरी है. नये संसद भवन मे प्रस्थापित किया जाने वाला चौल वंशीय राजदंड, प्राचीन भारत की महान विरासत का अद्भुत प्रतीक है जो भारत की बढ़ती हुई महत्वाकांक्षा और इच्छाशक्ति को दिखाता है. यह निष्पक्ष और न्यायसंगत शासन के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है.

1947 मे सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीक के रूप मे अंग्रेजो ने यह राजदंड जवाहर लाल नेहरू जी को दिया था. इसके शीर्ष पर भगवान शिव के वाहन नंदी को बनाया गया है जो न्याय और कर्म को दर्शाता है.
इसके बाद भी इस सेंगोल को पिछले 75 सालों तक वो सम्मान नही मिला जो अपेक्षित था। आज वही राजदंड को जब श्री नरेंद्र मोदी जी ने संसद में स्थापित किया है तो आज उन सभी को पेट मे दर्द हो रहा है जिन्हें ये लगता था कि ये भारत भूमि उनकी बपौती है और अंग्रेजों ने सिर्फ उन्हें ही राज करने के लिए चुना है।
भारत में आज भी लोकतंत्र पूरी तरह से स्थापित है और नतीजा देखने को मिला कि निरंकुश शासन को जनता ने दंड दिया और उस कुर्सी पर बैठने वाले उचित व्यक्ति को चुनकर संसद भेजा जिसने खुद राजदंड को स्थापित कर एक मिसाल कायम की। जिसने यह भी बताने का प्रयास किया कि अगर वह भी गलती करें तो वह भी दंड के भागी होंगे जो हमारी संस्कृति ने तय किया है।

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