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करम की डाली पर मचा घमासान : जनजातीय आस्था के पर्व (करम ) को चर्च में मनाने पर सवाल, रांची में जनजातीय संगठनों का विरोध

करम पर्व को लेकर केंद्रीय सरना समिति ने जताई आपत्ति, रांची में प्रेस वार्ता कर चर्च परिसर में करम की डाल स्थापित किए जाने का किया विरोध।
करम पर्व को लेकर केंद्रीय सरना समिति ने जताई आपत्ति, रांची में प्रेस वार्ता कर चर्च परिसर में करम की डाल स्थापित किए जाने का किया विरोध।

झारखंड इन दिनों करम पर्व की तैयारी में है। गांवों से लेकर शहरों तक अखड़े (अखाड़ा को स्थानीय भाषा मे अखड़ा कहा जाता है) सज रहे हैं। मांदर और नगाड़ों की थाप सुनाई देने लगी है। बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि की कामना कर रही हैं और जनजातीय समाज अपनी सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार करम देवता की पूजा की तैयारी में जुटा है।

लेकिन इस बार करम पर्व केवल उत्सव और परंपरा के कारण चर्चा में नहीं है। राजधानी रांची में इसे लेकर एक ऐसा विवाद खड़ा हुआ है, जिसने जनजातीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े कई पुराने सवाल फिर सामने ला दिए हैं।

विवाद का केंद्र में चर्च परिसर में करम की डाल स्थापित करके करम पर्व मनाया जाना है। इस मामले को लेकर केंद्रीय सरना समिति सहित विभिन्न आदिवासी और जनजातीय संगठनों ने इसका विरोध किया है। संगठनों का आरोप है कि आदिवासी समाज के पारंपरिक पर्वों को ईसाई धार्मिक व्यवस्था में शामिल करने और उनके मूल स्वरूप में परिवर्तन करने का प्रयास किया जा रहा है। 16 सितंबर 2026 को संगठनों ने रांची के उपायुक्त को ज्ञापन देकर ऐसे आयोजनों पर रोक लगाने की मांग भी की।

करम केवल एक उत्सव नहीं

करम पर्व (करम परब) को समझे बिना इस विवाद को समझना मुश्किल है। करम पर्व करम देवता की पूजा का पर्व है, जिन्हें शक्ति, यौवन और जीवन-ऊर्जा से जुड़ा माना जाता है। भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाए जाने वाले इस पर्व में युवक जंगल से करम की लकड़ी, फल और फूल लेकर आते हैं और पूजा की जाती है। गीत-संगीत और सामूहिक नृत्य भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

जनजातीय समाज की अलग-अलग परंपराओं में करम पर्व से जुड़ी मान्यताओं में कुछ अंतर जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन इसके मूल में प्रकृति, कृषि, जीवन, सामुदायिक एकता और पारिवारिक मंगलकामना का भाव मौजूद है। कई क्षेत्रों में बहनें भाइयों की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए उपवास करती हैं। अखड़े में करम की डाल स्थापित होती है। पाहन द्वारा करम कथा सुनाई जाती है और उसके बाद पारंपरिक गीत और नृत्य होते हैं। करम गीतों और कथाओं में कर्म, प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक जीवन के संदेश मिलते हैं।

यानी करम की डाली केवल एक पेड़ की शाखा नहीं है। यह जनजातीय समाज की आस्था, स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है। सवाल ये है कि जब ये परंपरा जनजातीय समाज और जनजातीय संस्कृति से जुड़ा है तो फिर इसमें चर्च की भूमिका कहाँ से आ गई?

रांची में जनजातीय संगठनों ने आरोप लगाया है कि कुछ चर्चों में करम की डाल को स्थापित करके करम पर्व को ईसाई पद्धति के साथ मनाया जा रहा है। इसके रांची प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में केंद्रीय सरना समिति और अन्य संगठनों ने कुछ प्रकाशित पुस्तकों का हवाला देते हुए दावा किया कि आदिवासी पर्वों का अध्ययन और उनमें संशोधन कर उन्हें ईसाई तरीके से मनाने की बात कही गई है। संगठनों ने विशेष रूप से ‘खड़िया धर्म और संस्कृति का विश्लेषण’ और ‘आदिवासी मिस्सा संग्रह’ का उल्लेख किया। उनके अनुसार इन्हीं विचारों के आधार पर सरहुल और करम जैसे पर्वों को ईसाई पद्धति से मनाने का प्रयास किया जा रहा है।

जनजातीय संगठनों के सवाल हैं कि जिस करम पर्व की अपनी पारंपरिक पूजा-पद्धति है, जिसका अपना पाहन है, जिसका अपना अखड़ा है, जिसकी अपनी कथा और अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है, उसे चर्च की व्यवस्था में शामिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?

मिशनरी गतिविधियों को लेकर पुराना विवाद

झारखंड में मिशनरी गतिविधियां और जनजातीय समाज में कन्वर्जन को लेकर लंबे समय से सार्वजनिक बहस के विषय रहे हैं। मिशनरी संस्थाओं की भूमिका को लेकर समर्थक पक्ष शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा को प्रमुखता देता है, जबकि विरोध करने वाले जनजातीय संगठनों का आरोप रहा है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर जनजातीय समुदायों के बीच सेवा गतिविधियों के साथ धार्मिक प्रभाव और कन्वर्जन की प्रक्रिया भी चलती रही है।

झारखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में कन्वर्जन को लेकर समय-समय पर विवाद और आरोप सामने आते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में करम पर्व से जुड़ा वर्तमान विवाद केवल एक कार्यक्रम का विवाद नहीं रह जाता। जनजातीय संगठन इसे अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का प्रश्न बता रहे हैं।

भारत की जनजातीय परंपराओं में प्रकृति, पेड़-पौधे, जल, जंगल और भूमि का विशेष महत्व रहा है। करम भी इसी व्यापक सांस्कृतिक संसार का हिस्सा है।इसलिए जनजातीय संगठनों का कहना है कि यदि करम की डाली को चर्च परिसर में स्थापित किया जाता है और उसके साथ ईसाई समाज के अनुष्ठान जोड़े जाते हैं, तो यह केवल किसी त्योहार में भागीदारी नहीं रह जाती, बल्कि उस पर्व की धार्मिक व्याख्या और स्वरूप को बदलने का प्रश्न बन जाता है।

संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनका विरोध किसी समुदाय के अपने धार्मिक पर्व मनाने को लेकर नहीं है। उनका कहना है कि ईसाई समुदाय अपने पर्व स्वतंत्र रूप से मनाए, लेकिन आदिवासी पहचान वाले पर्वों को ईसाई पद्धति में बदलकर मनाने का विरोध किया जाएगा।

सवाल केवल करम का नहीं

करम को लेकर उठा यह विवाद एक बड़े प्रश्न की ओर भी संकेत करता है कि क्या किसी समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा को उसके धार्मिक संदर्भ से अलग करके किसी दूसरे धार्मिक ढांचे में समाहित किया जा सकता है?

जनजातीय संगठनों का आरोप है कि यही प्रक्रिया यदि लगातार चलती रही तो आने वाली पीढ़ियां अपनी मूल परंपराओं और उनके धार्मिक अर्थ से दूर हो सकती हैं। उनका कहना है कि पहले पर्व और परंपराओं को बदला जाएगा, फिर उनकी व्याख्या बदलेगी और धीरे-धीरे नई पीढ़ी के सामने वही बदला हुआ स्वरूप मूल परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। इसी को वे सांस्कृतिक हस्तक्षेप मानते हैं।

रांची में विरोध क्यों हुआ तेज ?

16 सितंबर को ज्ञापन और उसके बाद प्रेस वार्ता के जरिए संगठनों ने प्रशासन के सामने अपनी आपत्ति रखी।

केंद्रीय सरना समिति, जनजाति सुरक्षा मंच, झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति समेत विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर आवाज उठाई। प्रेस वार्ता में केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा, प्रधान महासचिव अशोक मुंडा, मुख्य पाहन जगलाल पाहन, जनजाति सुरक्षा मंच के संदीप उरांव, डॉ. बिरसा उरांव और झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति के अध्यक्ष मेघा उरांव समेत अन्य प्रतिनिधि मौजूद रहे।

वहीं करम पर्व को लेकर जनजातीय संगठनों की दूसरी गतिविधियां भी तेजी से चल रही हैं। रांची के ओरमांझी में आदिवासी सरना पड़हा समाज ने 22 सितंबर को करमा पूजा और 23 सितंबर को पारण करने का निर्णय लिया है तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों के पालन की अपील की है। रांची में नगर निगम ने भी शहर के 298 सरना स्थलों और अखड़ों पर सफाई, रोशनी, पेयजल और दूसरी सुविधाओं की व्यवस्था की तैयारी की है।

यानी एक तरफ जनजातीय समाज अपने पारंपरिक केंद्रों—अखड़ों और सरना स्थलों—पर करम की तैयारी कर रहा है, दूसरी तरफ चर्च में करम की डाल स्थापित किए जाने को लेकर विवाद सामने आ गया है।

बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या यह सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई बन रही है?

भारत की सांस्कृतिक परंपरा की विशेषता रही है कि अलग-अलग समुदायों ने प्रकृति और जीवन से जुड़े अनेक पर्वों को अपने-अपने तरीके से जीवित रखा है। जनजातीय समाज की परंपराएं भी इसी भारतीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।करम पर्व इसका एक बड़ा उदाहरण है।

परंपरा की रक्षा के लिए उठती आवाज

करम पर्व के मौके पर जनजातीय समाज के भीतर से जिस तरह पारंपरिक रीति-विधान के पालन की अपील हो रही है, वह भी महत्वपूर्ण है। रांची में केंद्रीय सरना संघर्ष समिति ने 22 सितंबर को उपवास और रात्रि पूजा, 23 सितंबर को पारण और 24 सितंबर को करम डाली विसर्जन की जानकारी दी है। समिति ने अखड़े में पारंपरिक ढोल, नगाड़े और मांदर के साथ पर्व मनाने की अपील की है।

हालांकि झारखंड में जिस तरह से मिशनरी संस्थाओं का दबदबा उसे हिसाब से यह देखना दिलचस्प होगा कि इस विवाद पर सरकार और प्रशासन की कैसी प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।

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