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भारतीय लोकतंत्र की सबसे लंबी और सबसे विवादित माँगों में से एक है महिला आरक्षण। दशकों तक चली बहस के बाद जब मौजूदा सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक (संशोधन) लाया, तो अपेक्षा थी कि यह कम से कम लोकसभा में पारित हो जाएगा। पर हुआ उल्टा। विधेयक लोकसभा की दीवार से टकराकर रुक गया। विपक्षी दलों- कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य- ने इसे “राजनीतिक स्टंट” करार दिया। सरकार पर आरोप लगाया कि यह बिल सिर्फ वोट बैंक की राजनीति के लिए लाया गया था।

मान लिया जाए, कि यह आरोप सही है। मान लिया जाए कि सरकार की मंशा शुद्ध राजनीतिक थी। फिर भी एक सवाल उठता है- इसमें महिलाओं का क्या दोष था? अगर राजनीति के चक्कर में भी महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें मिल जातीं, तो देश चलाने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ जाती, तो इसमें क्या बुराई थी? क्या महिलाओं का सशक्तिकरण किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होना चाहिए?

विपक्षी दलों के नेता आज जश्न मना रहे हैं जैसे उन्होंने कोई महान युद्ध जीत लिया हो। और सबसे आश्चर्यजनक, सबसे दर्दनाक तथ्य यह है कि इस पुरुष-प्रधान देश में महिला आरक्षण को रोकने का जश्न सबसे ज्यादा महिलाएँ ही मना रही हैं। विपक्षी पार्टियों की महिला नेताएँ, महिला सांसदें और महिला कार्यकर्ताएँ भी उसी लय में तालियाँ बजा रही हैं जिस लय में उनके पुरुष सहयोगी बजा रहे हैं। अगर वे एक पल के लिए “महिला” होकर सोचतीं- पार्टी की झंडी, टिकट और अगले चुनाव से ऊपर उठकर सोचतीं- तो शायद उन्हें एहसास होता कि उन्होंने अपने भविष्य के साम्राज्य को स्वयं ही अपने शोषक के हाथों सौंप दिया है।

आज भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या 14-15 प्रतिशत से ऊपर नहीं जाती। फैसले पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं, नीतियाँ पुरुष-केंद्रित दृष्टिकोण से बनती हैं। जब महिलाएँ राजनीति में शोषण, यौन उत्पीड़न, टिकट न मिलने और घरेलू दबाव की शिकायत करती हैं, तो वे सही कहती हैं। लेकिन जब वही शोषण खत्म करने का एक ठोस कदम उठने वाला था, तो उन्होंने उसी पुरुष-प्रधान राजनीति के सामने घुटने टेक दिए।

आरक्षण मिल जाने पर महिलाओं को अपनी पकड़ बनती। उनका एक अलग रुतबा बनता। वे पुरुषों के बराबर न केवल संख्या में, बल्कि निर्णय लेने की मेज पर भी बैठतीं। तब पुरुष सहयोगी भी शोषण करने से पहले सौ बार सोचते। क्योंकि अब सामने कोई कमजोर “महिला उम्मीदवार” नहीं, बल्कि एक सशक्त, जनादेश प्राप्त महिला सांसद होती। राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पाते। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच भी उन्हें अपनी आवाज़ रखने का हक मिलता।

यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि यह केवल 33 प्रतिशत सीटों का सवाल नहीं है। यह आधे आबादी के भविष्य का सवाल है। अगर विपक्ष की महिलाएँ आज “पार्टी लाइन” पर खड़ी होकर आरक्षण का विरोध कर रही हैं, तो वे कल अपने बेटियों और पोतियों को क्या जवाब देंगी? कि “हमने तो पार्टी की एकजुटता के लिए अपना अधिकार छोड़ दिया”?

पुरुषों को तो कुछ खोना नहीं था। वे पहले से ही बहुमत में हैं। वे पहले से ही राज कर रहे हैं। लेकिन महिलाओं ने, जो दशकों से शोषण का रोना रोती आईं, आज शोषण करने वालों के साथ खड़े होकर अपने आने वाले अस्तित्व को ही कुचल दिया। यह आत्म-धोखा है। यह स्वयं के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।

राजनीति में दलगत हित ऊपर हो सकते हैं, लेकिन जब बात आधी आबादी के संवैधानिक अधिकार की हो, तो विवेक को ऊपर उठना चाहिए। महिला आरक्षण किसी एक पार्टी का एजेंडा नहीं, बल्कि लोकतंत्र को पूर्ण करने का एजेंडा है। अगर यह बिल राजनीतिक मकसद से भी लाया गया था, तो भी इसे रोकना महिलाओं के साथ किया गया अपराध है।

जब तक महिलाएँ खुद “महिला” होकर नहीं सोचेंगी, तब तक कोई भी पार्टी उन्हें बराबरी का हक नहीं देगी। आज का जश्न कल पछतावे में बदल सकता है। क्योंकि राजनीति अस्थायी है, लेकिन सशक्तिकरण स्थायी है।

महिलाओं का भविष्य राजनीति की भेंट चढ़ गया- यह दुखद सत्य है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि अगला मौका आने पर महिलाएँ अगर अपनी सोच बदलेंगी, तो यह हार अंतिम नहीं होगी। सवाल सिर्फ यह है- क्या वे तैयार हैं अपनी पार्टी की दीवारों से बाहर निकलकर, पहले “महिला” बनकर सोचने के लिए?

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