आज यह खबर पढ़कर सच में कलेजा फट गया। मन में सवाल आया कि ‘झारखंड के जनजातीय इलाकों में अंधविश्वास के नाम पर हत्या का दौर कब खत्म होगा?’
काफी मंथन के बाद एक बात दिमाग में आई कि 26 वर्ष पहले बिहार से कटकर अलग राज्य झारखंड का निर्माण इसलिए हुआ था, ताकि यहां रहने वाले जनजातीय समाज की उन्नति हो सके। वे शिक्षित और जागरूक बन सकें। विकास के काम, जो उन तक नहीं पहुंच पाते थे, आसानी से पहुंच सकें। जब बिहार और झारखंड एक थे, तब इस समाज का प्रतिनिधित्व करने वालों की कमी थी, उनकी समस्याएं ऊपर तक नहीं पहुंचती थीं। लेकिन अब तो 26 साल बीत गए। हर तरफ जनजातीय से लेकर अगड़े-पिछड़े समाज के प्रतिनिधि विधानसभा से लोकसभा तक आवाज उठा सकते हैं।
फिर भी यह प्रश्न यथावत हैं कि अब कौन-सी कमी रह गई? क्यों जनजातीय समाज तक न समुचित विकास पहुंच पा रहा है, न जागरूकता? कब तक अंधविश्वास के नाम पर लोग मरते रहेंगे? कभी ओझा-गुनी के नाम पर, तो कभी प्रार्थना सभा या चंगाई सभा के नाम पर अत्याचार होता रहेगा?
और यह समस्या केवल “जागरूकता की कमी” भर नहीं है।
यह गरीबी की भी कहानी है। यह लाचार शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी की भी कहानी है। यह दूर-दराज़ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपस्थिति की भी कहानी है। यह प्रशासनिक सुस्ती और कानून के कमजोर क्रियान्वयन की भी कहानी है।
जब गांव में अस्पताल नहीं होगा, डॉक्टर नहीं होगा, वैज्ञानिक सोच नहीं पहुंचेगी तब अंधविश्वास ही इलाज बन जाएगा। जब प्रशासन समय पर हस्तक्षेप नहीं करेगा, तब भीड़तंत्र ही न्याय करने लगेगी।
ऐसा नहीं है कि इस तरह की घटना पहली बार हुई है। वर्ष 2025 में लोहरदगा में डायन बिसाही के शक में एक परिवार के तीन सदस्यों को कुल्हाड़ी से काट डाला गया था। इसी वर्ष अगस्त में एक 75 साल की जनजातीय महिला की गला रेतकर हत्या कर दी गई, क्योंकि पड़ोसी ने उस पर डायन होने का आरोप लगाया। दिसंबर में देवघर में एक बुजुर्ग महिला का सिर काटकर शव पत्थर की खदान में फेंक दिया गया। यह तो सिर्फ 2025 की कहानी थी, हर वर्ष ऐसी कई कहानियां आती है छपती है और खो जाती है।
NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2023 से 2025 के बीच 24 लोग अंधविश्वास के नाम पर मारे गए और मामलों में 100% की बढ़ोतरी हुई। ये तो वे मामले हैं जो सामने आ गए। कितने ऐसे होंगे जो डर, दबाव और सामाजिक चुप्पी के कारण दबा दिए गए , इसका अंदाज़ा कौन लगाएगा?
झारखंड में डायन बिसाही जैसी कुप्रथा को रोकने के लिए कानून भी बना है — Prevention of Witch (Daain) Practices Act। लेकिन सवाल यह है कि कानून किताबों में है या जमीन पर? अगर कानून का डर होता, तो क्या इस तरह खुलेआम हत्याएं होतीं?
जनजातीय समाज में जागरूकता की कमी से अंधविश्वास फैल रहा है, लेकिन समस्या सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। इस समाज के बच्चे, बुज़ुर्ग, बेटियां और जमीनें भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। कहीं तस्करी का खतरा है, कहीं जमीन हड़पने की साजिश, और कहीं सामाजिक बहिष्कार का डर।
अब सवाल उठता है कि सरकार के जागरूकता अभियान का क्या हुआ?
क्या वे सिर्फ फाइलों में चल रहे हैं?
क्या पंचायत स्तर पर वैज्ञानिक सोच विकसित करने का कोई ठोस कार्यक्रम है?
क्या स्कूलों में अंधविश्वास विरोधी शिक्षा दी जा रही है?
क्या हर ब्लॉक में विशेष निगरानी तंत्र बना है?
कागज़ों में योजनाएं बनाना आसान है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि आज भी अंधविश्वास के घोड़े पर सवार होकर कई गांवों में व्यवस्था चल रही है।
हर तीसरे-चौथे दिन जनजातीय इलाकों से ऐसी घटनाओं की खबरें सामने आती हैं। यह कोई पहली या दूसरी घटना नहीं है या फिर कोई अपवाद भर नही है, यह एक सामाजिक संकट का संकेत है। लेकिन हमारा समाज 30 सेकंड की रील देखकर स्वाइप करने में व्यस्त है। जब तक आग अपने घर तक न पहुंचे, तब तक हम सब “निद्रा” में हैं।
जहां तक जनप्रतिनिधियों की बात है, झारखंड की मौजूदा सरकार तो खुद को जनजातीय समाज का “सुपरहीरो” बता ही रही है। ग्रामीणों तक विकास पहुंचे ना पहुंचे लेकिन जब ग्रामीण शहर में आए तो उन्हें विकास के बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिखने चाहिए, इसलिए सरकार उसमें व्यस्त है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या गांवों में वैज्ञानिक सोच पहुंची? क्या महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हुई? क्या जमीनों की रक्षा हुई?
अगर सरकार सच में मसीहा है, तो इन मौतों को रोककर दिखाए। बेटियों को तस्करों से बचाकर दिखाए। जनजातीय समाज की लूट रही जमीनों को बचाकर दिखाए।
वरना यह मान लेना चाहिए कि 26 साल का “विकास” अभी भी कागजी घोड़ा ही है — जो फाइलों में दौड़ता है, ज़मीन पर नहीं।

