रांची, 13 जून: भारतीय राजस्व सेवा (IRS) की अधिकारी निशा उरांव ने धर्मांतरण और आदिवासी परंपराओं के मुद्दे पर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि धर्मांतरित आदिवासियों को पारंपरिक धार्मिक पदों पर नहीं रहना चाहिए। उनका कहना है कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं की रक्षा के लिए पारंपरिक पदों पर उन्हीं लोगों की नियुक्ति होनी चाहिए जो मूल आदिवासी आस्था और परंपराओं का पालन करते हों।
निशा उरांव ने कहा कि पड़हा, डोकलो सोहर, पाहन और अन्य पारंपरिक सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं आदिवासी संस्कृति की पहचान हैं। यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर चुका है, तो उसे स्वेच्छा से ऐसे धार्मिक पदों को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि धार्मिक जिम्मेदारियों का निर्वहन उसी आस्था के अनुरूप होना चाहिए जिसके आधार पर ये पद स्थापित किए गए हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि ग्राम सभा केवल प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्था का भी केंद्र है। ऐसे में ग्राम सभा की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि या तथाकथित “चंगाई सभा” का आयोजन नहीं होना चाहिए।
निशा उरांव ने धर्मांतरण को आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक विरासत के लिए चुनौती बताते हुए कहा कि समाज को अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक मूल्यों के संरक्षण के लिए जागरूक होना होगा। उनके इस बयान के बाद राज्य में धर्मांतरण, आदिवासी अधिकारों और पारंपरिक व्यवस्थाओं को लेकर बहस तेज हो गई है।
धार्मिक पदों पर धर्मांतरित आदिवासियों की भूमिका को लेकर दिए गए इस बयान ने आदिवासी समाज के भीतर एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। विभिन्न सामाजिक संगठनों और समुदायों के बीच इस विषय पर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं, जबकि पारंपरिक व्यवस्था के समर्थक इसे आदिवासी संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यक कदम बता रहे हैं।

