बंगाल में अघोषित राष्ट्रपति शासन: केंद्र की चाबुक और ममता सरकार की बौखलाहट
( संतोष कुमार सिंह )
पश्चिम बंगाल आज एक ऐसे राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जहाँ औपचारिक रूप से राष्ट्रपति शासन तो घोषित नहीं हुआ, लेकिन जमीन पर हालात ठीक उसी की तस्वीर पेश कर रहे हैं। मुख्य मंत्री ममता बनर्जी खुद इसे “अघोषित” या “बैकडोर” राष्ट्रपति शासन बता रही हैं। चुनाव आयोग की बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फेरबदल, केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती और सुप्रीम कोर्ट की बार-बार की फटकार ने राज्य सरकार की स्वायत्तता को लगभग समाप्त-सा कर दिया है। क्या यह लोकतंत्र की जीत है या फिर केंद्र की रणनीतिक दखलंदाजी? चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और ऊंट किस करवट बैठेगा, यह देखने के लिए पूरा देश इंतजार कर रहा है।
सबसे पहले बात गृह मंत्री अमित शाह की। अप्रैल 2026 में शाह बंगाल में लगातार सक्रिय हैं। रोडशो, रैलियाँ और 170 सीटों का लक्ष्य तय करते हुए उन्होंने साफ संदेश दिया है कि भाजपा अब बंगाल में “परिवर्तन” लाएगी। उनके आने के साथ ही केंद्र की उपस्थिति और भी मजबूत हो गई है। इसी बीच चुनाव आयोग ने रिकॉर्ड 2.4 लाख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती की है- यह किसी एक राज्य में चुनाव के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इतनी विशाल फोर्स सिर्फ सुरक्षा के नाम पर नहीं, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था पर केंद्र के नियंत्रण का प्रतीक भी है। पिछले चुनावों में हुई हिंसा को देखते हुए यह तैनाती जरूरी हो सकती है, लेकिन विपक्ष इसे “राज्य पर कब्जा” मान रहा है।
इसके साथ ही उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की शक्ति का खात्मा हो चुका है। चुनाव आयोग ने सैकड़ों वरिष्ठ IAS और IPS अधिकारियों का सामूहिक तबादला कर दिया। ममता बनर्जी ने इसे “अघोषित राष्ट्रपति शासन” करार दिया। राज्य की मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और जिला प्रशासन की रीढ़ हिल गई है। ममता का आरोप है कि केंद्र और चुनाव आयोग मिलकर बंगाल को प्रशासनिक रूप से लकवाग्रस्त कर रहे हैं। नतीजा? राज्य सरकार के हाथ बंधे हुए हैं और केंद्र की मर्जी के बिना कुछ भी नहीं हो पा रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी बंगाल सरकार और प्रशासन को जोरदार फटकार लगाई है। मालदा में special intensive revision के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों जिनमें तीन महिला जज भी शामिल को नौ घंटे तक घेरकर रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “पूर्व-नियोजित, गणना-आधारित और प्रेरित” कार्रवाई बताया। मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सरकार को “कर्तव्य-त्याग” का दोषी ठहराया। डीजीपी और मुख्य सचिव को नोटिस जारी किए गए। कोर्ट ने कहा कि बंगाल “सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य” बन गया है, जहाँ राजनीतिक भाषा हर स्तर पर घुस गई है। इससे पहले आई-पीएसी छापे और ईडी कार्रवाई के मामलों में भी कोर्ट ने ममता सरकार को सख्त सवालों से घेरा। स्पष्ट है कि न्यायपालिका अब बंगाल प्रशासन को “अनियंत्रित” नहीं छोड़ना चाहती।
ममता बनर्जी सरकार की कार्यशैली में दोषपूर्ण तत्व अब खुलकर नजर आ रहे हैं। हार की झलक उनकी बौखलाहट में साफ दिख रही है। किसी भी आलोचना या विरोध पर हमला- सिर्फ जुबानी नहीं, शारीरिक भी। चुनावी रैलियों में हिंसा, विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमले और प्रशासनिक दबाव की खबरें लगातार आ रही हैं। इतनी बेचैनी कि हर कदम पर “साजिश” का रोना रोया जा रहा है। पिछली बार 2021 में मिली भारी जीत के बाद ममता ने बंगाल को “अपना किला” समझ लिया था, लेकिन अब वही कार्यशैली उनके लिए बोझ बन गई है। स्थानीय स्तर पर ऑटो-रिक्शा चालक, छोटे व्यापारी और आम हिंदू मतदाता – जो कभी कैमरे के सामने नहीं आते – उनकी कार्यशैली को अच्छी तरह जानते हैं। यही मतदाता इस बार “साइलेंट वोटर” बनकर निर्णायक साबित हो सकते हैं।
एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल अभी तक एक बात साफ बता रहे हैं- भाजपा और तृणमूल के बीच जबरदस्त टक्कर। कुछ सर्वे में तृणमूल को 184-194 सीटें मिलती दिख रही हैं, तो कुछ में भाजपा 98-108 तक पहुँच रही है। लेकिन क्या ममता बनर्जी पिछली बार जैसी भारी जीत दोहरा पाएंगी? मुश्किल लगता है। उनकी हरकतों ने सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार दोनों का “चाबुक” अपनी शक्तियों पर चला दिया है। मुस्लिम वोटर इस बार पूरी तरह कंफ्यूज है। एक तरफ उनके “कौम के नेता” जो अलग-अलग दलों में बंटे हुए हैं, दूसरी तरफ उनकी “चहेती दीदी”। वोट का बिखराव ममता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।
दूसरी ओर हिंदू मतदाता, जो अक्सर खुलकर मीडिया के सामने नहीं आते, इस बार चुपचाप अपना फैसला सुनाने वाले हैं। लोकल स्तर पर ममता दीदी की कार्यशैली- भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण और प्रशासनिक लापरवाही- उनके मन में गहरी छाप छोड़ चुकी है। यही “अदृश्य वोट” चुनावी मैदान का रुख बदल सकता है।
चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। बंगाल का भविष्य अब सिर्फ एक सवाल पर टिका है- क्या केंद्र की मजबूत निगरानी और न्यायपालिका की फटकार ममता सरकार को सबक सिखाएगी, या फिर “दीदी” की पुरानी जादूगरी एक बार फिर काम आ जाएगी? ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका फैसला 2026 के चुनाव परिणाम तय करेंगे। लेकिन एक बात तय है- बंगाल अब पहले जैसा नहीं रहा। केंद्र की नजर, कोर्ट की निगरानी और मतदाताओं की जागरूकता ने खेल को पूरी तरह बदल दिया है। लोकतंत्र की इस परीक्षा में कौन जीतेगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन “अघोषित नियंत्रण” की इस कहानी ने बंगाल की राजनीति को हमेशा के लिए नया रूप दे दिया है।

