Tue. Jan 20th, 2026

भगवान बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर विशेष

20200609 222943 compress97 | Rashtra Samarpan News





–रितेश कश्यप
–Twitter : @meriteshkashyap


भले ही सन 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ प्रथम विद्रोह असफल हुआ मगर पुरे देश में अंग्रेजों का आतंक की चर्चा खुलेआम होनी शुरू हो गयी थी । कई जगह पर स्वत्रंता सेनानी अपनी अपनी जगह से अंग्रेजों के खिलाफ अपना मोर्चा खोल चुके थे । वहीँ अंग्रेजों ने भी सिर्फ बल का ही प्रयोग ना करते हुए भारतीय संस्कृति पर भी हमला करना शुरू कर दिया था और इसमें उनका सबसे बड़ा हथियार चर्च और इसाई मिशनरी बने। इसी हथियार का उपयोग भारत के सीधे सादे आदिवासीयों पर किया गया । 1947 को अंग्रेज भारत छोड़ कर तो चले गए मगर उनके इसाई मिशनरी और चर्चों द्वारा शुरू किया गया सांस्कृतिक युद्ध अब भी जारी है।

भारत के इतिहास में ऐसे कई महापुरुष हुए जिन्होंने अपने भारत की संस्कृति को बचाने  के लिए ना सिर्फ अपने जीवन का बलिदान दिया अपितु समस्त समाज को कई सन्देश भी दिए जिनका अनुकरण कर हम अपने देश और संस्कृति की रक्षा कर सकें । आज हम बात करने वाले हैं झारखण्ड की पवित्र धरा पर आदिवासी परिवार में जन्मे भगवान् बिरसा मुंडा की। 
भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा को एक महान देशभक्त , क्रन्तिकारी, जननायक एवं समाजसुधारक के तौर पर देखा जाता है। उनकी लड़ाई सिर्फ अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ ही नहीं, बल्कि आदिवासियो के धर्मान्तरण के खिलाफ भी थी। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासियों ने महान आंदोलन ‘उलगुलान’ को अंजाम दिया। वह महज 25 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए थे। उनके किये गए अलौकिक कार्यों की वजह से उन्हें भगवान बिरसा और धरती आबा के नाम से भी पुकारा जाता है। उन्होंने काले कानूनों को चुनौती देकर बर्बर ब्रिटिश साम्राज्य  और धर्मातरण के कार्य में लगे इसाई मिसनरीयों को सकते में डाल दिया और यही उनके मृत्यु का कारण भी बना।
भगवान् बिरसा मुंडा का जन्म 
भगवान बिरसा का जन्म तत्कालीन बिहार (अब झारखण्ड) के छोटानागपुर क्षेत्र स्थित तत्कालीन रांची (अब खूंटी)उलीहातू गाँव मे 15 नवंबर 1875 को हुआ था । पिता सुगना मुंडा और माता करमी हातू के घर में बृहस्पतिवार को जन्मे बच्चे का नाम बिरसा रखा । मुंडारी भाषा में बिरसा का मतलब बृहस्पतिवार को कहा जाता है। जिस गाँव में भगवान् बिरसा का जन्म हुआ उस जगह इसाई मिशनरीयों का काफी प्रभाव था । उसी प्रभाव के कारण उनके घर के सभी लोगों ने इसाई धर्म को अपना लिया था। उनके पिता सुगना मुंडा भी धर्म प्रचारकों के साथ इसाई धर्म के प्रचार में लगे रहते थे । बिरसा का बचपन अपने घर में, ननिहाल में और मौसी की ससुराल में बकरियों को चराते हुए बीता। बाद में उन्होंने कुछ दिन तक उनके नानी के घर ‘चाईबासा’  एक मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा गया मिशन स्कूल में दाखिला के लिए उनका इसाई होना जरुरी था इसीलिए उन्हें भी इसाई बनना पड़ा जिसके बाद उनका नाम बिरसा डेविड रखा गया । स्कूल में उन्हें इसाई धर्म की शिक्षा भी दी जाने लगी । बिरसा मुंडा का अपनी संस्कृति से लगाव के कारण ही उन्हें उनके स्कूल से निकलना पड़ा क्योंकि उनके मिशन स्कूल में उनके आदिवासी समुदाय से होने पर मजाक उड़ाया जाता था। उसी मजाक के जवाब में उन्होंने भी इसाई धर का मजाक उड़ना शुरू कर दिया जो वहां के पादरियों को नागवार गुजरा और उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया ।
विद्रोही बिरसा
भगवान् बिरसा ने आदिवासियों पर हो रहे जुल्म को करीब से देखा था ब्रिटिश सरकार आदिवासियों की जमीन धीरे धीरे हथिया रही थी. आदिवासियों के धार्मिक मामलों में भी दखल दिया जा रहा है. महज 15 वर्ष की आयु में सन 1890 को स्कूल से निकाले जाने के बाद ही उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जाने की योजना बनाई. इसके बाद उनके गुरु स्वामी आनन्द पाण्डे से उनका सम्पर्क हुआ उसके बाद ही उन्होंने उन्हें हिन्दू  धर्म और हिन्दुओं में आदिवासी संस्कृति को गहनता से जानने और समझने का मौका मिला । उन्होंने आदिवासी संस्कृति के साथ साथ   महाभारत, रामायण आदि ग्रंथों का भी अध्यन किया। कहा जाता है कि 1895 में कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं, जिनके कारण लोग बिरसा को भगवान का अवतार मानने लगे और लोगों ने उन्हें धरती आबा के नाम दिया। उनके प्रभाव के कारण लोग उनकी बाते सुनने और मानने लगे ।  बिरसा मुंडा  समाज में मौजूद अंधविश्वासों और इसाई मिशनरी के षड्यंत्रों का खंडन करने लगे। उन्होंने लोगों को धर्मांतरण से रोका और आदिवासी संस्कृति  का पालन करने की सीख दी। लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी। उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और जो मुंडा ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे। उसके बाद उन्होने अंग्रेजों के काले कानून के खिलाफ आदिवासी समुदाय को संगठित करना शुरू कर दिया था। 1893-94 मे पोड़ाहाट के जंगलों में बिरसा मुंडा ने सरदार विद्रोहियों के साथ 1882 मे बने अंग्रेजों के वन कानून का पुरजोर विरोध किया ।  बिरसा मुंडा इसाई मिशनरी और ब्रिटिश हुकूमत के निशाने पर तो थे ही इसीलिए उन्हें 1895 में उन्हें पहली बार गिरफ्तार कर 2 साल के लिए हजारीबाग के जेल भेज दिया गया ।  जेल से छोड़े जाने के समय अंग्रेजों द्वारा बिरसा मुंडा को धर्म प्रचार ना करने की चेतावनी भी दी गयी ।

बिरसा मुंडा का महान आन्दोलन “उलगुलान”

जेल से छूटने के बाद उन्होंने अपने अनुयायियों के दो दल बनाए। एक दल मुंडा संस्कृति का प्रचार करने लगा और दूसरा राजनीतिक कार्य करने लगा। नए युवक भी भर्ती किये गए। इस पर सरकार ने फिर उनकी गिरफ़्तारी का वारंट निकाला, किन्तु बिरसा मुंडा इस बार पकड़ में नहीं आये। इस बार का आन्दोलन बलपूर्वक सत्ता पर अधिकार के उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ा। अंग्रेज अधिकारियों और पादरियों को हटाकर उनके स्थान पर बिरसा के नेतृत्व में नये राज्य की स्थापना का निश्चय किया गया। 24 दिसम्बर, 1899 को यह आन्दोलन आरम्भ हुआ। जिसका नाम उलगुलान रखा गया। उस समय ब्रिटिश हुकूमत महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती मनाने के लिए समारोहों के आयोजन में व्यस्त थी ।  तभी बिरसा मुंडा ने नारा दिया- ‘आबुआ राज सेतेर जना, महारानी राज तुंडु जना.’ मतलब अब क्वीन विक्टोरिया का राज नहीं है ,हमारे इलाके पर हमारा राज है ।  बिरसा मुंडा ने गुरिल्ला आर्मी बनायी और अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन कर दिया ।  तीरों से कई पुलिस थानों पर आक्रमण कर उनमें आग लगा दी गई । अंग्रेज सेना से बिरसा मुंडा की गोरिल्ला आर्मी की भी सीधी मुठभेड़ हुई, किन्तु तीर कमान गोलियों का सामना नहीं कर पाये। बिरसा मुंडा के साथी बड़ी संख्या में मारे गए। ब्रिटिश हुकूमत के नाक में दम करने के बाद अंग्रेजों ने नयी चाल चली ।  अंग्रेजों ने उनके समुदाय के ही दो व्यक्तियों ने धन के लालच देकर 3 मार्च 1900 को चक्रधरपुर के पास के जंगल से बिरसा मुंडा  को दोबारा धोखे से गिरफ्तार करवा दिया गया . उऩके साथ 450 से भी ज्यादा गुरिल्ला विद्रोही गिरफ्तार किए गए । बिरसा मुंडा को रांची जेल लाया गया ।
लगभग 25 वर्ष के बिरसा मुंडा को अंग्रेजों द्वारा हद से ज्यादा यातनाएं दी गयी मगर देशभक्ति का जूनून जिसके सर पर एक बार सवार हो जाये उसे कहाँ तोड़ा जा सकता है । अंग्रेजों द्वारा जब सारी कोशिशें नाकाम होती दिखने लगी तो अंग्रेजों ने उन्हें उनके भोजन के साथ धीमा जहर देना शुरू कर दिया । 9 जून, 1900 ई. को जेल में उनकी मृत्यु हो गई। मगर ब्रिटिश हुकूमतों द्वारा ये बताया गया की उनकी मृत्यु का कारण हैजा था ।

बिरसा मुंडा आज भी जीवित हैं !!

झारखण्ड के लोक गीतों और जातीय साहित्य में बिरसा मुंडा आज भी जीवित हैं। बिरसा मुंडा सही मायने में पराक्रम और सामाजिक जागरण के धरातल पर तत्कालीन युग के एकलव्य और स्वामी विवेकानंद थे। भगवान् बिरसा मुंडा के मृत्यु के सैकड़ों सालों के बाद भी आदिवासी समुदाय इसाई मिशनरी के निशाने पर ही रहता है। आज आदिवासियों की संख्या में लगातार कमी देखी जा रही है और इसका मूल कारण धर्मान्तरण और वामपंथी राजनीती ही है । उन्हें उनकी संस्कृति से दूर किया जा रहा है। जिस समुदाय के लिए भगवान् बिरसा ने अपने जीवन का बलिदान कर दिया आज वही समुदाय भगवान् बिरसा को अपना नेता मानते हुए भी उनके दिखाए पदचिन्हों पर चलता हुआ नही दीखता ।

 आज हम सभी को यह सवाल  खुद से पूछने की जरूरत है कि वर्तमान का आदिवासी या वनवासी समुदाय उन्ही मिशनरी के षड्यंत्रों में फंस कर अपनी संस्कृति और सभ्यता को कहीं  भूलता  तो नहीं जा रहा ?

आईये एक बार फिर हम भगवान् बिरसा के दिखाए गए रास्ते पर चलकर इस राष्ट्र और हमारी संस्कृति को विधर्मियों से बचाएं और यही भगवान् बिरसा को सच्ची श्रद्दांजलि होगी ।

By Rashtra Samarpan

राष्ट्र समर्पण एक राष्ट्र हित में समर्पित पत्रकार समूह के द्वारा तैयार किया गया ऑनलाइन न्यूज़ एवं व्यूज पोर्टल है । हमारा प्रयास अपने पाठकों तक हर प्रकार की ख़बरें निष्पक्ष रुप से पहुँचाना है और यह हमारा दायित्व एवं कर्तव्य भी है ।

Related Post

एक नजर इधर भी

error: Content is protected !!