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‘गुलाबी नाक का दुख’

By Rashtra Samarpan Nov 29, 2021

–मीना अरोड़ा

उन्होंने विरासत में नाक पाई, लेकिन नाक के साथ कुछ नहीं मिला यह सत्य नहीं। नाक के साथ वे अकूत संपत्ति के भी हकदार थे।

 नाक थी पर इज्जत ना थी। इस बात को यूं समझ सकते हैं कि घोटालों ने उनकी इज्जत गिरवी रखवा दी थी।इज्जत जब जब जाती तब तब नाक भी कटती। नाक,इज्जत और संपत्ति में गहरा कनेक्शन था। नाक जितनी बार नीची होती, संपत्ति का पहाड़ उतना ऊंचा हो जाता। संपत्ति की बढ़ोतरी के चक्कर में  उन्होंने कई बार नाक को कटवा कर गिरवी रखवाया पर, अपने पूर्वजों की संपत्ति पर आंच नहीं आने दी। एक अदद चीज जो उपहार स्वरूप पीढ़ी दर पीढ़ी उनके साथ थी, वह था खानदानी पड़ोस से उधार लिया गया उधारी नाम।उन्होंने उस उधार को खूब कैश किया। उसी की आड़ में जमकर ऐश भी की। 

इतना सब होते हुए भी उनकी एक समस्या थी वे किसी का दुख नहीं देख पाते थे। दुख शब्द सुनते ही उनकी आंखें गीली, नाक और गाल गुलाबी हो जाते। ऐसे में उस गुलाबी नाक के साथ यदि कोई उनका चित्र उतार दे, तो चित्र करोड़ों की कमाई कर जाता। यह देख उन्हें अपनी गुलाबी नाक पर फख्र होने लगता। जब कुछ माह बीत जाते और उनको अपना नया चित्र गुलाबी नाक के साथ प्रसारित करवाना होता तो वह शीघ्र ही दुखी लोगों को खोजते।  यदि कोई दुखियारा नहीं मिलता तो वे उदास हो जाते। इस उदासी में उनकी नाक और गालों का रंग जस का तस बना रहता।आंखों में संवेदनाओं के बादल भी ठीक से उमड़ते। ऐसे में वे परेशान होकर, अपने खोजी वफादार कुत्तों को चारों ओर यह कह कर भगाते कि उनके लिए ऐसे दुखी व्यक्ति, जो दुख से लबालब हों, खोजे जाएं।

 कुत्ते मालिक का इशारा पाकर अपनी अपनी वफादारी साबित करने की खातिर, खेत, खलिहान, घर, मैदान, चहुं ओर भाग पड़ते।

 पर उन्हें भी जब कोई दुखी नहीं मिलता तो वे खिसिया जाते और कुत्तेपन पर उतर आते।वे गरीबों की झोपड़ियां जला डालते, राहगीरों के कपड़ों को दांतों से खींच कर फाड़ डालते। उनके बदन को नोच डालते।फिर मालिक को गरीबों और राहगीरों के दुख की खबर पहुंचा देते। खबर के इंतजार में बैठे उनके मालिक झट से अपना गेटअप चेंज कर, अपने आंसू पोंछने को दर्जन भर रुमाल लेकर शीघ्र आ धमकते। घाव रिसते राहगीरों और गरीबों को हमदर्दी का मरहम लगाते। यदि कोई राहगीर उनके मरहम से संतुष्ट ना होता तो वे उसका सदा के लिए कष्ट निवारण कर, ऊपर का टिकट कटवा देते। कभी कभार रोष और जोश में आकर वे इतने टिकट कटवा देते, जिनकी गिनती वे स्वयं भी ना कर पाते।

 जब उनका दुख शांत हो जाता तो वे कुछ समय के लिए अपने महलों में जाकर विश्राम करते। दुखियों का दुख खोजने को

उनका अचानक आना और चले जाना,  आसमान में बिजली चमकने जैसा होता।हर कोई उनके बाहर निकल सड़कों पर आने से डरता।मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करता कि वे भीतर रहें बाहर ना आएं।प्रार्थना करने वालों को यह नहीं पता था कि स्वयं ईश्वर भी उनसे भय खाता है,क्योंकि उनके पागल कुत्तों ने कई बार ईश्वर का भी चीर हरण कर डाला।

आज  वे सब फिर से खोज रहे हैं उनके लिए दुख और दुखी लोग, क्योंकि बहुत दिन हुए उनकी नाक गुलाबी नहीं हुई।

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राष्ट्र समर्पण एक राष्ट्र हित में समर्पित पत्रकार समूह के द्वारा तैयार किया गया ऑनलाइन न्यूज़ एवं व्यूज पोर्टल है । हमारा प्रयास अपने पाठकों तक हर प्रकार की ख़बरें निष्पक्ष रुप से पहुँचाना है और यह हमारा दायित्व एवं कर्तव्य भी है ।

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