झारखंड, 29 जनवरी: भारतीय राजनीति में जाति और आरक्षण जैसे मुद्दे हमेशा से संवेदनशील रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में कुछ नेताओं के बयान इतने विषाक्त हो गए हैं कि वे समाज की एकता को सीधे चुनौती दे रहे हैं। हाल ही में राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय प्रवक्ता कंचना यादव का एक बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि जनरल कास्ट वालों को यूजीसी एक्ट में फंसाया जाना चाहिए, क्योंकि इन्होंने 90 प्रतिशत आबादी वाले माइनॉरिटी को उनका हक नहीं दिया। आपको गलत केस में फंसाया जाना चाहिए।
यह बयान न केवल कानूनी प्रक्रियाओं का मजाक उड़ाता है, बल्कि सामाजिक न्याय के नाम पर नफरत और विभाजन को बढ़ावा देता है। कंचना यादव, जो खुद डेटा साइंस और मशीन लर्निंग में कैंसर पर पीएचडी धारक हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं। इन जैसी शिक्षित महिला से ऐसी सोच की उम्मीद नहीं की जाती। यह घटना दर्शाती है कि शिक्षा कितनी भी हो, राजनीतिक महत्वाकांक्षा समाज में जहर घोलने की प्रवृत्ति को नहीं रोक सकती।
यह बयान आरजेडी की प्रवक्ता द्वारा एक वीडियो में दिया गया, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तेजी से फैला। इसमें उन्होंने युवा जनरल कैटेगरी छात्रों को फॉल्स चार्जेस में फंसाने की बात कही, क्योंकि उनके अनुसार उन्होंने एससी, एसटी, ओबीसी समुदायों को, जो कथित तौर पर 90 प्रतिशत आबादी वाले माइनॉरिटी हैं, उनके अधिकार नहीं दिए। यहां 90 प्रतिशत को माइनॉरिटी कहना एक विरोधाभासी और भ्रामक तर्क है, जो बहुमत को अल्पसंख्यक के रूप में पेश करके जातिगत राजनीति को हवा देता है।
यह बयान यूजीसी रेगुलेशंस और आरक्षण से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में आया, जहां आरजेडी जैसे दल सामाजिक न्याय की आड़ में ऐसे बयान देकर वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानूनी दुरुपयोग को बढ़ावा देकर न्याय हासिल किया जा सकता है? यादव का यह दावा कि हजार सालों की सजा के रूप में फर्जी केस में फंसाना उचित है, न केवल संविधानिक मूल्यों का उल्लंघन है, बल्कि यह समाज में बदले की भावना को भड़काता है।
इस बयान की पृष्ठभूमि में बिहार की जातिगत राजनीति को समझना जरूरी है। आरजेडी, जो तेजस्वी यादव के नेतृत्व में है, लंबे समय से ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के आरक्षण और जातिगत जनगणना को अपना मुख्य एजेंडा बनाए हुए है। लेकिन इस बार का बयान सीमा पार कर गया, क्योंकि इसमें स्पष्ट रूप से फर्जी मुकदमों को हथियार बनाने की बात है। सोशल मीडिया पर इसकी प्रतिक्रियाएं तीखी रही हैं- कई यूजर्स ने इसे विषाक्त मानसिकता कहा, जबकि अधिकांश आलोचनाएं इसे विभाजनकारी मानती हैं, जो युवाओं को जाति के आधार पर लक्षित करती है।
यह घटना व्यापक समस्या की ओर इशारा करती है। राजनीतिक दल सामाजिक न्याय के नाम पर नफरत फैलाकर सत्ता की रोटियां सेंकते हैं। कंचन यादव जैसी शिक्षित नेत्री का यह बयान दर्शाता है कि कैसे उच्च शिक्षा भी जातिवादी सोच से मुक्त नहीं कर पाती। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में ऐसे बयान समाज को और खंडित करते हैं, जहां पहले से ही जातिगत हिंसा और भेदभाव की घटनाएं आम हैं। यह न केवल कानून के शासन को कमजोर करता है, बल्कि युवा पीढ़ी को प्रभावित करता है- वे जो शिक्षा और रोजगार की तलाश में हैं, उन्हें जाति के जाल में फंसाया जा रहा है।
समय आ गया है कि ऐसे नेताओं का पर्दाफाश किया जाए। राजनीति में जवाबदेही होनी चाहिए- चाहे वह आरजेडी हो या कोई अन्य दल। मीडिया, न्यायपालिका और नागरिक समाज को ऐसे विषाक्त बयानों पर सख्त रुख अपनाना चाहिए। कंचना यादव का पीएचडी होना कोई ढाल नहीं बन सकता; बल्कि यह और शर्मनाक है कि इतनी पढ़ाई के बाद भी सोच इतनी संकीर्ण है। समाज को एकजुट रहना होगा, ताकि नफरत की राजनीति हार जाए और सच्ची समानता जीते।
(नफरत का चश्मा पहने कुछ युवाओं की राजनीति चमकाने का हथियार बनता जा रहा है कमज़ोर कानून।)

