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पटना/रांची, 05 मार्च: हार और बिहार की राजनीति में कब क्या हो जाए, यह न तो कोई ठीक से जानता है और न ही कोई ठीक से समझ सकता है। यहाँ की राजनीति ऐसी है कि सुबह जो समीकरण बनते हैं, शाम तक उनका पोस्टमार्टम शुरू हो जाता है।

एक बार फिर बिहार में सियासी उलटफेर की चर्चा तेज हो गई है। बिहार की राजनीति में सबसे अधिक बार इस्तीफा देने का रिकॉर्ड रखने वाले मुख्यमंत्री Nitish Kumar एक बार फिर इस्तीफे की तैयारी में बताए जा रहे हैं।

हालाँकि इस बार कहानी थोड़ी अलग बताई जा रही है। इस बार वह इस्तीफा देकर किसी दूसरे खेमे में पलटी नहीं मार रहे हैं, बल्कि उसी खेमे के भीतर कोई नया दायित्व संभालने जा रहे हैं। राजनीति के जानकार इसे ऐसे भी समझ रहे हैं कि अब नीतीश कुमार धीरे-धीरे अपने राजनीतिक जीवन के “वानप्रस्थ आश्रम” की ओर बढ़ रहे हैं।

उधर कई सालों से बिहार में अपना खुद का मुख्यमंत्री बनाने का सपना देख रही Bharatiya Janata Party की मनोकामना शायद अब पूरी होने वाली है।

मामले को और दिलचस्प तब बना दिया जब वर्तमान राजनीति के “चाणक्य” कहे जाने वाले Amit Shah खुद बिहार पहुँचे और उन्होंने नीतीश कुमार से राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करवाया।

अब बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा?

और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री किसके कोटे से होगा? क्या यह पद Bharatiya Janata Party के पास जाएगा या फिर Janata Dal (United) के पास ही रहेगा? हालाँकि राजनीतिक हलकों में जो संकेत मिल रहे हैं, उससे इतना तो लगभग तय माना जा रहा है कि अगर नीतीश कुमार पद छोड़ते हैं तो इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा के हिस्से में ही आ सकती है।

अब राजनीति के पंडित अपना माथा खजुआ रहे हैं कि अगर मुख्यमंत्री भाजपा का होगा, तो कौन सा चेहरा होगा जिस पर पार्टी दांव लगाएगी।

चलिए इस पर भी थोड़ा विश्लेषण कर लेते हैं।

फिलहाल भाजपा के कोटे से बिहार में दो उपमुख्यमंत्री हैं। एक हैं अगड़ी जाति से आने वाले Vijay Kumar Sinha, और दूसरे हैं ओबीसी समाज से आने वाले Samrat Choudhary।

सम्राट चौधरी इस समय गृह विभाग भी संभाल रहे हैं, इसलिए कई लोगों का मानना है कि भाजपा अगर प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक पकड़ देखेगी तो उन पर दांव लगा सकती है।

अब रही बात विजय कुमार सिन्हा की। राजनीति के कुछ जानकार कहते हैं कि भाजपा सोशल इंजीनियरिंग में पहले ही “डॉक्टरेट” कर चुकी है। पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व भी बिहार से और अगड़ी जाति से आता है, इसलिए शायद विजय सिन्हा की संभावना थोड़ी कम दिखाई देती है।

लेकिन राजनीति में “कम संभावना” का मतलब “असंभव” नहीं होता। हाल के दिनों में अगर अगड़ी जाति के कुछ वर्गों में भाजपा के प्रति नाराजगी की चर्चा सही है, तो पार्टी संतुलन बनाने के लिए अचानक कोई नया फैसला भी कर सकती है।

कहीं किसी ‘यादव’ का राजयोग तो नहीं चल रहा?

लेकिन भाजपा की राजनीति केवल आज के हिसाब से नहीं चलती। वह आने वाले चुनावों को भी ध्यान में रखकर फैसले लेती है।

इसी वजह से एक और दिलचस्प संभावना की चर्चा चल रही है कि क्या भाजपा यादव समाज से किसी नेता को मुख्यमंत्री बना सकती है? अगर ऐसा होता है तो वह कौन से यादव जी होंगे जिनका राजयोग भारी है?

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि बिहार में यादव समाज की आबादी लगभग 14 से 16 प्रतिशत मानी जाती है और पारंपरिक रूप से इसे Rashtriya Janata Dal का मजबूत वोट बैंक माना जाता है।

अगर भाजपा इस वोट बैंक में सेंध लगाना चाहे तो यादव समाज से किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा राजनीतिक खेल खेल सकती है।

अब अगर नामों की बात करें तो चर्चा में सबसे पहले Nityanand Rai का नाम आता है।

दूसरा नाम है Nand Kishore Yadav, जो बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और पार्टी के पुराने वफादार नेताओं में गिने जाते हैं।

और राजनीति के गलियारों में एक तीसरा नाम भी तैर रहा है—Ram Kripal Yadav।

वो पहले राजद में थे, फिर भाजपा में आए। ऐसे में अगर भाजपा उन्हें आगे करती है तो इसका संदेश भी अलग जाएगा।

अगर ऐसा हुआ तो यादव वोट बैंक दो हिस्सों में बँट सकता है और इससे भविष्य में राजद की राजनीति को बड़ा झटका भी लग सकता है।

मुख्यमंत्री छोड़िए अब बात करते हैं उपमुख्यमंत्री का

अब मान लीजिए कि भाजपा सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा को छोड़कर किसी तीसरे चेहरे को मुख्यमंत्री बना देती है।

तो उसके बाद एक और दिलचस्प स्थिति बन सकती है कि दोनों के हाथों में कोई न कोई मंत्रालय तो रहेगा लेकिन उपमुख्यमंत्री पद चला जायेगा।

ऐसी स्थिति में यह भी संभव है कि Janata Dal (United) के कोटे से दो उपमुख्यमंत्री बनाए जाएँ।

राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि अगर नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति से थोड़ा पीछे हटते हैं तो उनके बेटे Nishant Kumar को पार्टी में लाकर उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।

हालाँकि जदयू से दूसरा उपमुख्यमंत्री कौन होगा, यह अभी भी सस्पेंस बना हुआ है। बिहार की राजनीति में सस्पेंस खत्म हो जाए तो फिर मज़ा ही क्या रह जाएगा!

कुल मिलाकर बिहार की राजनीति फिर उसी मोड़ पर खड़ी है जहाँ हर दिन नई कहानी बन सकती है।

यहाँ कभी भी कोई भी चाल चल दी जाती है और फिर राजनीतिक विश्लेषक अगले दिन बैठकर उस चाल का मतलब समझते रहते हैं।

अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आखिर कौन बैठता है,और बिहार की राजनीति अगला कौन सा नया ट्विस्ट लेकर आती है।

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