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सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के विवादित इक्विटी नियमों पर लगाई रोक, 2012 के पुराने नियम लागू रखने का आदेश

20260129 162543 | Rashtra Samarpan News

नई दिल्ली, 29 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने आज उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने वाले विवादित यूजीसी के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 पर तत्काल रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने इन नियमों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना से भरा बताते हुए कहा कि ये समाज में विभाजन पैदा कर सकते हैं और बहुत गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं।

कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत आदेश दिया कि 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नए नियम अगले आदेश तक स्थगित रहेंगे। इस दौरान 2012 के पुराने यूजीसी नियम ही पूरे देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में लागू रहेंगे। केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया गया है, और मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।

यूजीसी ने इन नियमों को उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव रोकने और समानता बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किया था। इनमें इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर और इक्विटी कमिटी बनाने, 24×7 हेल्पलाइन, शिकायतों का 15 दिनों में निपटारा और उल्लंघन पर सख्त सजा जैसे फंडिंग रोकना, डिग्री प्रोग्राम बंद करना या मान्यता रद्द करना जैसे प्रावधान थे।

लेकिन मुख्य विवाद रेगुलेशन 3(c) पर था, जिसमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल एससी, एसटी और ओबीसी सदस्यों के खिलाफ भेदभाव तक सीमित थी। याचिकाकर्ताओं में वकील विनीत जिंदल और मृत्युंजय तिवारी ने तर्क दिया कि यह परिभाषा एकतरफा है, सामान्य वर्ग के छात्रों-शिक्षकों को संरक्षण नहीं देती, आर्टिकल 14 का उल्लंघन करती है और असंवैधानिक है।

कोर्ट ने टिप्पणियां करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया नियम अस्पष्ट हैं, दुरुपयोग की पूरी संभावना है। क्या हम 75 साल की प्रगति के बाद पीछे की ओर जा रहे हैं? क्या हम समाज को विभाजित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं? ये प्रावधान बहुत व्यापक हैं, समाज में खतरनाक प्रभाव डाल सकते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार एक प्रतिष्ठित ज्यूरिस्ट्स की कमिटी बनाकर नियमों को फिर से ड्राफ्ट करे और स्पष्ट भाषा में लाए।

फिलहाल 2012 के नियम लागू रहेंगे, जो ज्यादा समावेशी थे और सभी वर्गों के खिलाफ भेदभाव को कवर करते थे। नए नियमों का भविष्य मार्च की सुनवाई पर निर्भर करेगा। शिक्षा मंत्री और यूजीसी ने पहले कहा था कि नियमों का दुरुपयोग नहीं होगा, लेकिन कोर्ट के फैसले से अब इन्हें संशोधित करना होगा।

यह फैसला उच्च शिक्षा में समानता और संवैधानिक संतुलन के मुद्दे पर महत्वपूर्ण है। छात्रों और शिक्षाविदों के बीच राहत की लहर है, जबकि सामाजिक न्याय के पक्षधरों ने इसे निराशाजनक बताया है। मामले पर आगे की सुनवाई में और स्पष्टता आने की उम्मीद है।

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