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रामगढ़/रांची, 3 अप्रैल 2026: एक समय की कट्टर समर्थक लेखिका मधु पूर्णिमा किश्वर द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाए गए गंभीर और अश्लील आरोपों ने राजनीतिक वातावरण को फिर से विषैला बना दिया है। सोशल मीडिया पर अपनी “धुरंधर 4” श्रृंखला में किश्वर ने मोदी को “प्रेडेटर” करार देते हुए “सेक्सुअल करप्शन” का आरोप लगाया है। उन्होंने दावा किया कि कुछ महिलाओं को सांसद टिकट और मंत्रिपद “घनिष्ठ संबंधों” के बदले दिए गए। स्मृति इरानी, मंसी सोनी जैसे नामों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 2014 से ही वे मोदी से दूरी बनाए रखती आई हैं क्योंकि उनकी “पर्सनैलिटी डिसऑर्डर” और अनैतिक आचरण की अफवाहें उनके कानों तक पहुंच चुकी थीं। उन्होंने यहां तक कहा कि मोदी “कम्प्रोमाइज्ड” हैं और यूपीए काल की कुछ फाइलें उनके खिलाफ इस्तेमाल हो सकती हैं।

ये आरोप बिना किसी ठोस सबूत, दस्तावेज, ऑडियो, वीडियो या स्वतंत्र गवाह के लगाए गए हैं। सिर्फ “संगठन के अंदर की फुसफुसाहटें” और “पुरानी अफवाहें” आधार बताए गए हैं। इतिहास गवाह है कि पिछले 12 वर्षों में मोदी पर तरह-तरह के व्यक्तिगत हमले हुए- मौन साधने से लेकर विदेशी एजेंट तक- लेकिन कोई भी आरोप साबित नहीं हुआ। फिर भी हर चुनावी मौसम में ऐसे आरोप दोहराए जाते हैं।

मधु किश्वर की पृष्ठभूमि इस मामले को और दिलचस्प बनाती है। वे 2002 के गुजरात दंगों के बाद मोदी की मुखर समर्थक बनीं। उनकी किताब Modi, Muslims and Media मोदी की तारीफ से भरी थी। उन्होंने उन्हें “गेम चेंजर” बताया और वामपंथी-फेमिनिस्ट दायरे से निकलकर राष्ट्रवादी विचारधारा की तरफ झुकीं। लेकिन 2014 के बाद राज्यसभा या कोई महत्वपूर्ण पद न मिलने पर उनकी टोन बदलती गई। अब वे पुरानी वामपंथी विचारधारा की ओर लौटती दिख रही हैं और पुराने साथियों का समर्थन भी उन्हें मिल रहा है। कई विश्लेषक इसे “स्कॉर्न्ड वुमन” की बौखलाहट या महत्वाकांक्षा की असफलता से जोड़ रहे हैं।

विपक्ष, खासकर कांग्रेस, इस मुद्दे को भुनाने में जुट गया है। राहुल गांधी और अन्य नेताओं ने इसे “सच्चाई का खुलासा” बताते हुए प्रधानमंत्री पर हमला बोल दिया है। देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनावों का माहौल है। महिलाओं के वोट बैंक को प्रभावित करने के लिए “महिलाओं के शोषण” का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। लेकिन सवाल यह है- जब विकास, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और सुशासन जैसे बड़े मुद्दों पर विपक्ष के पास ठोस जवाब नहीं बचते, तो क्या निजी जीवन पर कीचड़ उछालना ही एकमात्र रणनीति रह जाती है?

यह पहली बार नहीं है। भारतीय राजनीति में विपक्ष अक्सर “व्यक्तिगत हमले” का सहारा लेता है। नेहरू, इंदिरा, राजीव, वाजपेयी, मनमोहन सिंह- सभी पर ऐसे आरोप लगे, लेकिन साबित बहुत कम हुए। आज मोदी सरकार ने राम मंदिर, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, जी20 नेतृत्व, कोविड प्रबंधन जैसे उपलब्धियों का रिकॉर्ड पेश किया है। लेकिन विपक्ष इसे नजरअंदाज कर “चरित्र हनन” पर उतर आया है।

मधु किश्वर जैसे बुद्धिजीवी अगर सच बोल रही हैं तो उन्हें ठोस सबूत पेश करने चाहिए और कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए। अफवाहों और सोशल मीडिया पोस्ट से लोकतंत्र नहीं चलता। वहीं, सत्ता पक्ष को भी इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए स्वतंत्र जांच की मांग करनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आए। चुप्पी या सिर्फ खंडन से काम नहीं चलेगा।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। जब प्रधानमंत्री पर ही “सेक्सुअल करप्शन” जैसे आरोप लगते हैं, तो वैश्विक मंचों पर देश की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। क्या विपक्ष इसकी कीमत समझता है?

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती मुद्दों पर बहस में है, न कि व्यक्तिगत कीचड़ उछालने में। अगर विपक्ष के पास महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट जैसे असली मुद्दों पर समाधान नहीं है, तो जनता इसे समझ रही है। सस्ती सनसनी से सत्ता नहीं मिलती। जनता विकास और स्थिरता चाहती है, न कि चरित्र हनन की राजनीति।

समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दल नैतिकता की सीमा तय करें। बिना सबूत के आरोप लगाना और उन्हें वायरल करना लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। सच्चाई की जांच हो, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ में देश की गरिमा को बलि न चढ़ाया जाए। जनता अंतिम फैसला करेगी- और वह फैसला मुद्दों पर होगा, अफवाहों पर नहीं।

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