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अवैध घुसपैठ : भारत के अस्तित्व, संसाधनों और सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा

अवैध घुसपैठ और जनसंख्या असंतुलन देश के लिए खतरा
अवैध घुसपैठ और जनसंख्या असंतुलन देश के लिए खतरा (प्रतीकात्मक तस्वीर )

 

भारत में अवैध घुसपैठ को लंबे समय तक केवल सीमा प्रबंधन या प्रशासनिक चुनौती के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन विभिन्न सरकारी आंकड़ों, शैक्षणिक संस्थानों की रिपोर्टों और जनगणना के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि यह विषय अब जनसंख्या संतुलन, संसाधन वितरण और आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ता जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, सीमावर्ती राज्यों से लेकर देश के प्रमुख महानगरों तक जनसांख्यिकीय बदलाव देखे जा रहे हैं, जिनका आकलन नीति निर्माण के स्तर पर किया जाना आवश्यक है।

सीमावर्ती राज्यों में जनसंख्या परिवर्तन

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बांग्लादेश सीमा से सटे राज्यों में जनसंख्या संरचना में उल्लेखनीय बदलाव सामने आया है।

  • असम के 13 जिले
  • पश्चिम बंगाल के 5 जिले
  • बिहार के 4 जिले
  • झारखंड के 2 जिले

इन कुल 24 जिलों में हिंदू समुदाय की हिस्सेदारी अल्पसंख्यक स्तर पर पहुंचने की बात कही गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ अवैध घुसपैठ की भूमिका पर भी अध्ययन आवश्यक है।

दिल्ली में अवैध अप्रवासी: JNU रिपोर्ट के निष्कर्ष

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) द्वारा जारी एक अध्ययन में राजधानी में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या अप्रवासियों की उपस्थिति का उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रवृत्ति के कारण दिल्ली में जनसंख्या संतुलन में बदलाव दर्ज किया जा रहा है।

जनगणना के आंकड़े (दिल्ली)

  • 1951 में मुस्लिम आबादी: 5.7%
  • 2011 में मुस्लिम आबादी: 12.9%

इस अवधि में दिल्ली में मुस्लिम आबादी में 7.2% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि राष्ट्रीय औसत वृद्धि 4.4% रही।

वहीं—

  • हिंदू आबादी 1951 में 84.2%
  • 2011 में घटकर 81.7%

मुंबई: क्या कहता है TISS रिपोर्ट?

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) की रिपोर्ट के अनुसार मुंबई में भी जनसंख्या संरचना में दीर्घकालिक बदलाव देखा गया है।

  • 1961 में हिंदू आबादी: 88%
  • 2011 में हिंदू आबादी: 66%

इसी अवधि में—

  • मुस्लिम आबादी 8% से बढ़कर 22% हो गई

TISS की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि यही रुझान जारी रहता है, तो आने वाले दशकों में मुंबई की जनसंख्या संरचना में और परिवर्तन संभव है।

असम: दशकों पुराना मुद्दा

असम में अवैध घुसपैठ को लेकर चिंता स्वतंत्रता के बाद से ही व्यक्त की जाती रही है।

  • 1951 में मुस्लिम आबादी: लगभग 12%
  • 2021–2024 के बीच अनुमानित हिस्सेदारी: 40% के आसपास

2001 में असम के 6 जिले मुस्लिम बहुल बताए गए थे, 2011 में यह संख्या बढ़कर 9 हुई, और वर्तमान में यह आंकड़ा 11 से अधिक माना जा रहा है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार राज्य में लगभग 29 लाख बीघा (करीब 10 लाख एकड़) भूमि अतिक्रमण के अधीन है, जिसमें बड़ी मात्रा संदिग्ध नागरिकों के कब्जे में बताई गई है।

पश्चिम बंगाल: प्रवेश मार्ग और जनसंख्या आंकड़े

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संसद और सार्वजनिक मंचों पर यह कहा गया है कि पश्चिम बंगाल के 24 परगना क्षेत्र में बड़ी संख्या में अवैध घुसपैठियों के दस्तावेज तैयार होने के बाद वे देश के अन्य हिस्सों में फैल जाते हैं।

जनगणना के अनुसार—

  • 1951 में मुस्लिम आबादी: 19.8%
  • 2011 में मुस्लिम आबादी: 27%

संख्या के लिहाज से यह 51 लाख से बढ़कर 2.47 करोड़ तक पहुंची।
इसी अवधि में हिंदू आबादी 78.7% से घटकर 70.5% रह गई।

झारखंड: संथाल परगना में जनसंख्या बदलाव

झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्र संथाल परगना में जनसंख्या परिवर्तन को लेकर अध्ययनकर्ताओं ने चिंता जताई है।

  • 1951 में आदिवासी आबादी: 44.7%
  • 2011 में: 28.1%

वहीं मुस्लिम आबादी—

  • 9.4% से बढ़कर 22.7%

कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 117% से 123% तक दर्ज किए जाने का उल्लेख किया गया है।

जवारलाल नेहरू ने भी नही दिया था ध्यान

असम में घुसपैठ की समस्या 1947 के बाद सामने आई थी।
तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ने इस विषय में सरदार वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखकर अवगत कराया था।
सरदार पटेल ने इस संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भी पत्राचार किया था, जो ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

जनसांख्यिकी और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध घुसपैठ का विषय केवल मानवीय या राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि डेटा-आधारित नीति, सीमा प्रबंधन, दस्तावेज सत्यापन और स्थानीय प्रशासन की भूमिका के माध्यम से देखा जाना चाहिए।

उपलब्ध आंकड़े संकेत देते हैं कि अवैध घुसपैठ का प्रभाव केवल सीमावर्ती राज्यों तक सीमित नहीं रहा है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों से लेकर आदिवासी क्षेत्रों तक जनसंख्या संरचना में बदलाव देखे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर संतुलित, तथ्यपरक और संवैधानिक दृष्टिकोण के साथ नीति निर्माण की आवश्यकता है।

 

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