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नई दिल्ली/रांची, 25 जनवरी: गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कार 2026 की घोषणा की। इस सूची में झारखंड आंदोलन के पुरोधा, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और आदिवासी समाज के नेता स्व दिशोम गुरु शिबू सोरेन को जनसेवा एवं सार्वजनिक जीवन के क्षेत्र में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है।

यह सम्मान केवल एक राजनेता को नहीं, बल्कि झारखंड राज्य निर्माण, आदिवासी अस्मिता और दशकों लंबे जनसंघर्ष को मिला राष्ट्रीय सम्मान माना जा रहा है।

आंदोलन की रीढ़ थे शिबू सोरेन

शिबू सोरेन का जीवन झारखंड के संघर्षों की जीवंत कहानी रही है। उन्होंने जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए आदिवासी और मूलवासी समाज को संगठित किया और अलग झारखंड राज्य की मांग को गांव-गांव से संसद तक पहुंचाया। उन्होंने झारखंड आंदोलन को जनआंदोलन का स्वरूप दिया और आदिवासी अधिकारों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थापित किया। उनके संघर्षों का ही परिणाम रहा कि वर्ष 2000 में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई जी के कार्यकाल में झारखंड राज्य का गठन संभव हो सका।

मुख्यमंत्री के रूप में योगदान

झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में शिबू सोरेन ने आदिवासी और पिछड़े वर्गों के कल्याण को प्राथमिकता दी। दूरदराज़ इलाकों तक प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ाई। सामाजिक न्याय, रोजगार और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार की बात उन्होंने मजबूती से रखी। उनकी राजनीति सत्ता से अधिक संघर्ष और सरोकारों से जुड़ी रही।

दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मिलने वाला पद्म भूषण सम्मान यह दर्शाता है कि देश ने उनके दीर्घकालीन सामाजिक-राजनीतिक योगदान और झारखंड के लिए किए गए ऐतिहासिक संघर्ष को औपचारिक मान्यता दी है। यह सम्मान झारखंड आंदोलन के उन सभी कार्यकर्ताओं और शहीदों को भी समर्पित माना जा रहा है, जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए संघर्ष किया।

पद्म पुरस्कार 2026

राष्ट्रपति द्वारा कुल 131 पद्म पुरस्कारों को मंजूरी दी गई है।

• पद्म विभूषण – 5

• पद्म भूषण – 13

• पद्म श्री – 113

इनमें 19 महिलाएं शामिल हैं। 6 सम्मानित व्यक्ति विदेशी नागरिक/NRI/PIO/OCI श्रेणी से हैं, जबकि 16 पुरस्कार मरणोपरांत दिए गए हैं।

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि आंदोलन के अग्रदूत दिशोम गुरु शिबू सोरेन को पद्म भूषण (मरणोपरांत) सम्मान मिलना हर झारखंडवासी के लिए गौरव का क्षण है। उन्होंने अपना पूरा जीवन झारखंड की पहचान, आदिवासी समाज के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन और सामाजिक न्याय की लड़ाई को समर्पित किया। उनका संघर्ष, समर्पण और जनसेवा की भावना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि झारखंड की मिट्टी, संघर्ष की परंपरा और जनआंदोलन की भावना का सम्मान है।

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