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झारखंड में पत्रकारों पर कब तक होता रहेगा पुलिसिया अत्याचार?

 

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आदित्यपुर: सरायकेला जिले के आदित्यपुर थाना प्रभारी बुधवार को एक्शन में नजर आए. हालांकि उनका एक्शन अपराधियों के खिलाफ नहीं, बल्कि निरीह पत्रकार के खिलाफ नजर आया. दरअसल मारपीट के मामले में घायल के थाना पहुंचने पर पत्रकार उसकी तस्वीर ले रहा था, अचानक थाना प्रभारी की नजर पड़ी और उन्होंने चीखते हुए अपने मातहतों को पत्रकार को अरेस्ट करने का आदेश दे डाला. मौके पर मौजूद एसआई सत्यवीर कुमार, एएसआई सुमन सिंह और उपेंद्र सिंह पत्रकार पर ऐसे टूट पड़े मानो वह कोई अपराधी हो. कोई पत्रकार का कैमरा छीन रहा था, तो कोई उसके कॉलर पकड़कर घसीटने का प्रयास कर रहा था. पत्रकार को सभी घसीटते हुए थानेदार के कक्ष में ले गए. अंदर उसके साथ क्या हुआ यह पत्रकार जाने और थानेदार. इस बीच थाना परिसर में मौजूद कुछ मीडियाकर्मियों की नजर थानेदार की हरकत पर पड़ गयी. मामला जानने पहुंचे पत्रकारों को भी थानेदार ने यह कहते हुए भगा दिया कि आपलोग भागिए यहां से. फिर वापस सभी पत्रकार थाना परिसर स्थित नीम पेड़ के नीचे आकर मंत्रणा करने लगे. उसके बाद उन्होंने सुमन सिंह और उपेंद्र सिंह से नीम पेड़ के नीचे जमे पत्रकारों को बुलावा भेजा. मगर पत्रकार अड़ गए नहीं गए. इस बीच कुछ बड़े नामचीन पत्रकारों को प्रभारी ने व्यक्तिगत फोन कर चेंबर में बुलाया जिसके कहने पर सभी पत्रकार चेंबर में गए वहां साथ चाय पी और जिस पत्रकार के साथ बदसलूकी की गई उसे साथ लेकर करीब आधे घंटे बाद विजेता के तर्ज पर बाहर निकले. वैसे अंदर में क्या वार्ता हुई यह वार्ता में शामिल पत्रकार ही बता सकते हैं. थाने में लगा सीसीटीवी इस पूरे प्रकरण की गवाही दे देगा, यदि उसके साथ छेड़छाड़ नही हुआ तो !

थाना प्रभारी को आराम की जरूरत

माना जा रहा है कि दो महीने में चार- चार हत्याओं के बाद हो रहे किरकिरी से आदित्यपुर के थानेदार परेशान हैं. उन्हें यह नहीं सूझ रहा है कि कौन अपराधी है, कौन पत्रकार. ऐसे में जिले के एसपी को चाहिए कि उन्हें कुछ दिनों के लिए आराम करने के लिए छुट्टी दें, ताकि उन्हें अपराधी और पत्रकार की समझ हो. 

पत्रकारिता बचानी हो तो बने सख्त पत्रकार सुरक्षा कानून

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. मगर इसकी अहमियत बस यही रह गई है, कि आप शासन- प्रशासन से इतर खबरें नहीं बना सकते. यदि बनाते हैं तो आपके खिलाफ धारा 353 कभी भी लग सकती है. यही कारण है कि अब खोजी पत्रकारिता हासिए पर जा रही है.  कानून की नजर में पत्रकारों की कोई अहमियत नहीं यही कारण है, कि पत्रकार लोकतंत्र का सबसे निरीह प्राणी बन गया है. पुलिस या सरकारी बाबुओं से सवाल पूछने या उनके खिलाफ लिखने पर सरकारी काम में बाधा पहुंचाने का मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है. ऐसे में निष्पक्ष, निर्भीक और खोजी पत्रकारिता करने से पत्रकार घबराने लगे हैं.

एक जिले में दो कानून क्यों  ? यदि सेनापति को पत्रकार के साथ बदसलूकी मामले में गिरफ्तार किया गया, तो आदित्यपुर के थाना प्रभारी एवं उनके मातहतों को रियायत क्यों ?

पिछले दिनों कांड्रा थाना अंतर्गत टॉल ब्रिज के समीप पत्रकारों से बदसलूकी के मामले में पत्रकारों के दबाव को देखते हुए पुलिस ने रामा कृष्णा फोर्जिंग कंपनी के अधिकारी शक्तिपद सेनापति को गिरफ्तार किया था, जिसे अभी तक जमानत नहीं मिली है, और एमजीएम अस्पताल में इलाजरत है. पुलिस के आला अधिकारी यह कहते सुने जा रहे हैं, कि पत्रकारों के साथ बदसलूकी करने के मामले में शक्तिपद सेनापति को गिरफ्तार किया गया है. पत्रकार संगठन भी इसको लेकर खूब वाहवाही बटोर रहे हैं. पुलिस को यह बतानी चाहिए कि पत्रकार के साथ मारपीट और कैमरा तोड़ने के मामले में किस धारा के तहत सेनापति की गिरफ्तारी हुई है. जिसे आजतक जमानत नहीं मिली है, ताकि अन्य पत्रकारों के साथ बदसलूकी मामले में वही धाराएं दर्ज कराई जाए. भले आदित्यपुर थाना परिसर में हुए पत्रकार के साथ बदसलूकी मामले में पत्रकारों ने समझौता कर लिया, मगर पत्रकारिता के लिए यह सही नहीं हुआ. पुलिस अधिकारियों को आदित्यपुर थाने में लगे सीसीटीवी फुटेज मंगवा कर पूरे मामले की सच्चाई जाननी चाहिए. यहां यह कह सकते हैं कि थानेदार के खिलाफ किसी पत्रकार ने लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई, इसलिए मामले को रफा- दफा कर दिया गया. आखिर किन परिस्थितियों में थानेदार ने पत्रकार के साथ बदसलूकी की ? अगर की तो क्यों की ? अंत में, ऐसी क्या परिस्थिति बनी कि पत्रकारों के हित को लेकर बड़ी- बड़ी डींगें हांकनेवाले पत्रकार समझौतावादी बन गए ?

Source: https://indianewsviral.co.in/saraikela-adityapur-police-officer-activity/

By Rashtra Samarpan

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